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Hanuman Chalisa (हनुमान चालिसा)
6th April, 2009
 
Hindi


श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनू मुकुरु सुधारि।
बरनऊঁ रघुबर बिमल जसु, जो दायकू फल चारी॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमेरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहि, हरहु कलेस बिकार॥

चौपाईः
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहूঁ लोक उजागर॥
राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
कांधे मूंज जनेऊ साजै॥
संकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग बंदन॥
विद्यावान गुनीअति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर सঁहारे।
रामचंद्र के काज सঁवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुवेर दिगपाल जहाঁ ते।
कबि कोबिद कहि सके कहाঁ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेस्वर भय सब जग जाना॥
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मघुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका लेली मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काम जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेरे॥
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रच्छक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हाঁक तें काঁपै॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै॥
अंत काल रघुबर पुर जाई।
जहाঁ जन्म हरि-भक्‍त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेई सर्व सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै सनुमत बलबीरा॥
जै जै जै हनुमान गोसाई।
कृपा करहु गुरु देव की नाई॥
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढे़ हनुमान चलीसा।
होय सिद्धि साखी गौरिसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ ह्रदय मঁह डेरा॥

दौहाः
पवनतनय संकट हरन,
मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित,
ह्रदय बसहु सुर भूप॥
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